Sunday, 18 October 2026

इक वनवासी छला गया है…

 जब जब सीता स्वर्ण हिरण को देख देख कर अतुराई है।        तब तब स्वर्णनगर स्वामी से इक वनवासी छला गया है।


निर्जन वन में करें भरोसा, करें भरोसा किस पर वन में।
इस द्विविधा का हल खोजो तो सूनापन छा जाता मन में।
जब जब किसी दशानन ने वन में साधु का भेष बनाया।
तब तब इस संसार का निश्चल हर सन्यासी छला गया है।

रेखा खींच लखन मननिश्चित मर्यादा का मान रहेगा।
स्वाधीनता होगी थोड़ी पर रक्षित स्वाभिमान रहेगा।
पर नियति के खेल के आगे कुछ विश्वास नहीं टिक पाए।
हर विश्वास के व्यापारी से हर विश्वासी छला गया है।

प्रेम का रिश्ता हो जिनसे उनकी हर इच्छा पूरित करना।
बन जाता है ध्येय निकटतम की हर आशा सिंचित करना।
मन से या मन मार के निज हित त्याग सफल करते हैं प्रेमी।
लेकिन स्वयं हो अभिलाषा तब हर अभिलाषी छला गया है।

                                                  - अनंत महेन्द्र