Saturday, 22 April 2017

चुनौती

अट्टाहास करती तुम,
निरीह सा खड़ा मैं।
तेरे चुनौतियों के समक्ष,
बेसुध सा पड़ा मैं।

पल प्रतिपल हुंकार भरती,
मानस चित्त में टंकार करती।
तुझसे संघर्ष की मुद्रा में,
बस धरा का धरा मैं।
बेसुध सा पड़ा मैं।

पुनः संचित कर आत्मबल,
एकीकृत कर के नभ-तल।
तेरा सामना करने को,
और एक बार अड़ा मैं
बारम्बार खड़ा मैं।
         ©  अनंत महेन्द्र

Friday, 10 February 2017

ख़ुश्क मौसम, रात रूमानी

वो खुश्क मौसम था, वो रात रूमानी
थी।
वर्षों छिपा रखा था, वो बात बतानी थी।
कैसे इज़हार कर देता, जो उन्हें थी जल्दी।
चंद लफ्ज़ पड़ते कम, वर्षों की कहानी थी।
वो खुश्क मौसम था, वो रात रूमानी थी।।

खड़े अकेले दोनों,सफेद चादर के शामियाने में।
होते रहे असफल, एक-दूजे को समझाने में।
वक्त की थी पाबंदी, पर यूँ ही सारी रात बितानी थी।
न कह पाया वो बात, जो उसे बतानी थी।
वो खुश्क मौसम था,वो रात रूमानी थी।

विरह की घड़ी टिकटिक चल रही थी।
हृदय में भावनाओं की धारायें उमड़ रही थी।
तभी लाल सुर्ख जोड़े में दौड़ जाना पड़ा उसे।
स्वयं के हृदय को आघात लगा, हृदय छोड़ जाना पड़ा उसे।
फिर अश्रू की धार, और एक अधूरी कहानी थी।
न वो खुश्क मौसम था, अब न रात रूमानी थी।

          अनंत महेन्द्र©®

Tuesday, 13 December 2016

क्षुदा की आग

बड़ी लम्बी फेहरिस्त है
इंसानी कामयाबी की
कोटि-कोटि अरबों के धन
चाँद में पहुँच बैठे हैं जन
मीलों दूर बैठे बतियाए
बस छोटे यंत्र कान लगाए

हृदय, गुर्दे तक बदले जाते
मरने वाले बचा लिए जाते
फैली कीर्ति दसों दिशा में
खूब करी तरक्की इंसा ने
पर इंसा तभी इंसा कहलाते
आग प्रत्येक क्षुदा की बुझा पाते
                     अनंत महेन्द्र ©

Thursday, 27 October 2016

कर गयी चोट, बस एक नजर दोस्तों

कभी सोचा न था, जिऊँगा मोहब्बत को।
मेरा दिल भी पा लेगा, किसी की सोहबत को
पर हुआ एक दिन, ऐसा गजब दोस्तों।
कर गयी चोट, बस एक नजर दोस्तों।

क्या बताऊँ, उन नजरों का कैसा था जादू।
होश रहा न खुद की, दिल हुआ था बेकाबू।
हाय! हम पर हुआ था, क्या असर दोस्तों।
जब कर गयी चोट, बस एक नजर दोस्तों।

लिख डाली कितनी शायरियाँ, उनकी याद में।
जब उन्होंने कहा था मिलूँगी, कुछ दिन बाद में।
फिर एक-एक पल लगने लगा था, कहर दोस्तों।
जब कर गयी चोट, बस एक नजर दोस्तों।

अब तो "अनंत" बस उनका एहसास ही बाकि है।
मिले न मिले वो, जीने को उनकी याद काफी है।
क्या करूँ काटने को दौड़ता है, शहर दोस्तों।
गहरी कर गयी चोट, बस वो नजर दोस्तों।।
                               "अनंत" महेन्द्र
                               २७/१०/२०१६

Saturday, 22 October 2016

रिश्ते

संबंधों की नींव पर
रिश्ते कर देते हो खड़े

स्व का अभिमान जब
दिखता है कंगूरे पर पड़े

थाह की टोह लगने लगती
गहराई कम जाती है

अंतस मन के दीवारों पर
रिश्तों की बेल सड़ जाती है
         
           © "अनंत" महेन्द्र
                १०.१०.२०१६

नारी स्वरूप को समर्पित

चित्त दीप्त, हृदय विकल
मृगमयी दृग,अधर कोंपल
अगाध उदधि अश्रुपूरित
मन ज्वाला सी उद्विलित
सारगर्भित अपरिभाषित
सदैव दात्री न्यून अभिलाषित
माँ, भगिनी, भार्या स्वरूप
हे नारी! नमन "अनंत" रूप
              © अनंत महेन्द्र
                २१.१०.२०१६

Thursday, 9 June 2016

तन्हाई

कहाँ गए
वो पल कहाँ गए
जिनमें महक थी
तेरी मौजूदगी की

कहाँ गए
वो जज्बात कहाँ गए
जिनमें भाव थे,
उद्विग्नता थी

कहाँ गए
वो एहसास कहाँ गए
जिनमें जिंदगी थी,
संजीदगी थी

अब तो बस
आडम्बर है
मुखौटे हैं
चहुँ ओर

और है सर्वव्याप्त
एक खालीपन
सूनापन,
कहाँ गए
वो मंजर-ए-जमात कहाँ गए..
         "अनंत"