Wednesday, 10 January 2018

मुक्तक

मुक्तक:
जहर जो जातिवादी घुल रहा अपने बसर में भी
जला देगा बहुत है आग इसके इक असर में भी
सियासत जब लगे मिलने जहर के इन सपोलों से,
समझ लो आ गया मतदान अब अपने शहर में भी।
        ©अनंत महेन्द्र

मुक्तक:
सियासत ने अगर दी मात तो स्वीकार कर लेना।
कहीं टूटा अगर विश्वास तो इसरार कर लेना।
मगर गहरे हुए जो घाव तो चुपचाप ना रहना।
कलम की धार जिंदाबाद तुम प्रतिकार कर लेना।
         © अनंत महेन्द्र

  
मुक्तक:
कहाँ को जा रहा इंसा कहाँ तक जा रहा इंसा
कभी इक दामिनी सी पुष्प को मुरझा रहा इंसा।
यहाँ बाबा मदरसे मौलवी के कर्म काले हैं।
अधर्मी बन चला हैवानियत को पा रहा इंसा।
                                  ©अनंत महेन्द्र
                                    ६/०१/२०१८  

Sunday, 17 December 2017

आँखों में पानी रहे न रहे...

दो कदम ऐ मुहब्बत तेरे संग चलूँ ,
और कोई कहानी रहे न रहे।

साँस रुक जाए धड़कन की तो ग़म नहीं,
फिर भले जिंदगानी रहे न रहे।

दिल में छप जाए तेरे निशां प्यार की,
और कोई  निशानी रहे न रहे।

बस गुज़र जाए कुछ वक़्त सोहबत में तेरे,
रात कोई सुहानी रहे न रहे।

वाहवाही ग़ज़ल को मिले तुझसे जो,
दुनिया मेरी दीवानी रहे न रहे।

आ लकीरें मिला लें माथे की अभी ही,
फिर ये चेहरा नूरानी रहे न रहे।

चंद गीतों को सुनने की मोहलत भी दे दो,
जाने कब ये ज़ुबानी रहे न रहे।

थोड़े अश्कों की बूँदे बह जाने दे मेरे,
जाने आँखों में पानी रहे न रहे।

      
                    ®© अनंत महेन्द्र
                        १५/१२/२०१७

Tuesday, 1 August 2017

कश्मीर की झाँकी

एक दिन मेरे कमरे में
  घुस गए साँप चार..
कश्मीरी पण्डितों सा
  बाहर निकला परिवार..
इसी बीच बहुत से लोग
   जमा हो गए..
आनन फानन में पुलिस
   और सेना इत्तला हो गए..

अब मैं खुश था कि सेना
  पल भर में इनको भगा देगी..
पर पशुप्रेमी मंत्री ने चेताया कि
  चली गोली तो केस लगा देगी..
मजबूरन बन्दूक फेंक
  सेनावाले ढेला चलाने लगे..
भागे नहीं साँप, जहर फेंकने को
  अपना फन फैलाने लगे..

बोले कुछ पड़ोसी भाई
  इनको क्यों भगा रहे हो..
छोटी सी बात का यूँ
  बतंगड़ क्यों बना रहे हो..
चंद घण्टे में ही बात, वन की
  ज्वाला सी फैलने लगी..
तेजी से चलने वाले दस
  चैनलों में खबर चलने लगी..

कहने लगे मीडिया वाले,
  जहर नहीं, साँप भी देखो..
बिंदी वाली संगठन बोली,
  मानवाधिकार तो सीखो..
इतने में एक सिपाही ने
  पैलेट गन चला दिया..
मारा गया था अभी एक ही साँप
  घटना ने पूरा संसद हिला दिया..

एक विपक्षी नेता ने संसद में
साँपो की व्यथा-कथा सुनाई..
थोड़े दिनों पश्चात् ही सर्वोच्च
  न्यायालय ने भी सहमति जताई..
मैं बेबस, असहाय यूँ ही
  घर के बाहर खड़ा रहा..
और मेरे स्वर्ग से आशियाने में
  साँप कुण्डली जमाये पड़ा रहा..

इतने में जो मेरा पड़ोसी मेरे
  घर पर नजरें जमाये बैठा था..
आ गया साँपों से मिलने, हाथों में
  मेढ़क और दूध का कटोरा था..
झाँसा मिला मुझे, अब मेरा घर
  उसी पड़ोसी के कब्जे में था..
नेताओं ने दी उसे ही शाबाशी,
  मैं निरीह तो बस सदमे में था..

हताश-निराश पछताता मैं
अनवरत दिन-रात रोता..
न देखने पड़ते ये दिन, ग़र सांपों को
खुद लाठी से कुचला होता..
                   "अनंत" महेन्द्र

वृद्धाश्रम

जो कभी तुझे उंगलियाँ पकड़कर,
   सारी राह चलाता था।
तेरी छोटी-बड़ी ख्वाइशों के लिए,
   पूरे माह कमाता था।
जो खुद कभी भूखा सो जाता पर,
  तेरे टॉफियाँ लाता था।
तेरी एक हँसी मुस्कान देखने,
थककर भी घर वापस आता था।

तेरे बीसियों एक से प्रश्नों के,
   जवाब वो हर बार देते थे।
तेरी हर जिद पूरी करने को,
   सर्वस्व वार देते थे।
जिसके हर एक शब्द में,
    कोई न कोई सबक होती है।
आज उनकी नेक सलाह भी,
    तुम्हें बकबक लगती है।

आज जब तुम खुद बड़े हो गए,
  पाँव पर अपने खड़े हो गए।
टूटी झोपड़ी अब मकान हो गया,
   पैसों पे तुम्हें अभिमान हो गया।
पिता के ईलाज के पैसों को,
    कहते हो नुकसान हो गया।

दो रोटी ही तो ज्यादा लगता है।
अरे वो तेरे बच्चों का दादा लगता है।
थोड़ा ही सही तुम ध्यान धरो।
उनके अनुभवों का सम्मान करो।
बस इतना ही तुम कर्म करो।
कि वृद्धाश्रम न फोन करो।
                   ©   अनंत महेन्द्र

Sunday, 30 July 2017

कलम की चाह

सुनो,बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं,
लिख दूँ क्या, तुम पर ही।
कूची का कलाकार तो नहीं,
कि बैठा रखूँ तुझे, सामने के सोफ़े पर।
पर मन तो चाहता है कि,
कलम मेरी जब-जब चले,
कुछ शब्द लिखे, जब भाव गढ़े।
तब लटें तेरी देख लिखूँ।
तेरे हाथ रहे ठोड़ी पर जब,
सिलवटें देख-देख लिखूँ।
तुम बैठे हुए थक जो जाओगी,
और कितनी देर! पूछ-पूछ उक्ताओगी।
मैं बहाने कर मुस्कुरा जाऊँ।
फिर चंद पंक्तियों की कविता सुनाऊँ।
फिर तुम ज़िद करो जाने की,
और मैं दूसरी कविता बनाने की।
सुनो, बडी देर से कुछ लिखा नहीं,
लिख दूँ क्या, फिर तुम पर ही।
                   © अनंत महेन्द्र
                       ३१/०७/२०१७

Saturday, 15 July 2017

तेरी याद में

तेरी कमी से ख़ामोश दीवारों दरख़्त
परदे झाँकते अहाते की ओर हर वक्त
कालीन सिलवटों में उलझी ही रही
काँटे घड़ी की अटकी रहती कम्बख़्त

दरवाजे की घंटी जैसे रुष्ठ हो मुँह बना रही
तेरी प्यारी टीवी रिमोट ओट में छुप जा रही
अब इन्तेहाई का आलम तुझसे और क्या कहूँ
एक्वेरियम की मछलियाँ भी दाना मना कर रही

तो अब ये बता कि मैगज़ीन के पन्ने
हवाओं से फड़फड़ाते रहेंगे क्या।
बगीचे के फूल तेरे स्पर्श के बिना,
खिलने के पहले मुरझाते रहेंगे क्या।
सर्द हवाएँ बन्द खिडकियों से टकरा,
यूँ ही लौट जाते रहेंगे क्या।
ये तन्हाइयों की काली परछाइयाँ
इन पर खिलखिलाते रहेंगे क्या।

या फिर, दोगे इनके मौन सवालों के जवाब
कि ये फिर से मुस्कुरा जाएँ तेरी तरह
नहीं तो कह दो इन्हें भी की पड़े रहे
निर्वात में निष्प्राण, मेरी तरह
         अनंत महेन्द्र
         १३/०७/२०१७

Wednesday, 24 May 2017

चलते-चलते

आज फिर मिल गयी चलते-चलते
आँख फिर झुक गयी चलते-चलते
यूँ मेरे सामने से ना गुजरे वो।
साँस न रूक जाए चलते-चलते।

आज फिर मिल गयी चलते-चलते
आँख फिर झुक गयी चलते-चलते
पल भर में मैं जी गया बरसों।
वक्त ही थम गया चलते-चलते।

आज फिर मिल गयी चलते-चलते
आँख फिर झुक गयी चलते-चलते
मेरा हर रोम-रोम गवाह होगा।
कैसे दिल मचल गया चलते चलते।

आज फिर मिल गयी चलते-चलते
आँख फिर झुक गयी चलते-चलते
पर तेरा मुझसे अजनबी बनना।
सब कुछ कह गया चलते चलते।
                   ©अनंत महेन्द्र