जब जब सीता स्वर्ण हिरण को देख देख कर अतुराई है। तब तब स्वर्णनगर स्वामी से इक वनवासी छला गया है।
Sunday, 18 October 2026
इक वनवासी छला गया है…
Saturday, 3 July 2021
विरह-गीत
विरह-गीत
कोलाहल कलरव है कैसा, कैसी ये आतुरता छाई।
क्यों मेघ विकल उमड़े जाते, क्यों मद्धम सी है अरुणाई।
ये अंतस कैसा भँवर उठा, क्यों नेत्र सजल हो आए हैं।
क्या विरहा की अग्नि की लपटें, मेरे हिस्से भी आई।
शाखों में अपना नीड़ त्याग पंछी क्या निर्वासित होता।
क्या मन की कोई पीड़ कहे, ये भाव न अनुमानित होता।
अब पूछ वियोगी सारस से जीवन का, निरुत्तर न करो।
कैसे दर्शा दे प्रेम कोई जब प्रेम न परिभाषित होता।
नाप सका क्या जग में कोई स्याह तमस की गहराई।
क्या विरहा की अग्नि की लपटें, मेरे हिस्से भी आई।
हमने रिश्तों की माला को रिस-रिस कर स्वयं पिरोया था।
एक प्रेम के पौधे के जड़ को अश्रु से स्वयं भिगोया था।
फिर जाने कैसी चूक हुई माला टूटी, पौधा उखड़ा।
दीवारें मौन रही साखी दिल कमरे में जब रोया था।
क्यों क्षुब्ध हुआ जीवन संगीत क्यों मौन हुई है शहनाई।
क्या विरहा की अग्नि की लपटें, मेरे हिस्से भी आई।
✍️ अनंत महेन्द्र
मुक्तक
हमने सूनी नज़्में सारी रातों में लिख डाली।
जज्बातों की किस्मत बातों बातों में लिख डाली।
युग-युग से जो अक्षर-अक्षर थे मन के कोने में।
अश्रु की बूंदों से उसके हाथों में लिख डाली।
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मुखमंडल को देखा मैंने, आभा देख नहीं पाया।
क्षण में जाने कहाँ गयी वो, ज्यादा देख नहीं पाया।
राह भटककर केश झटककर, एक पता पूछा मुझसे।
आँखों में उलझा बैठा मुख सारा देख नहीं पाया।
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प्रेम के तन्हा सफर में यूँ अकेले चल रहे हैं।
हम अमावस में किसी जूगनू की भाँति जल रहे हैं।
हाथ अपना खींचकर रिश्ते से रिश्तों के शिखर पर,
चढ़ चुके वो हम हजारों की नज़र से ढल रहे हैं।
✍️ अनंत महेन्द्र
Friday, 30 August 2019
ग़ज़ल अनंत महेन्द्र
किनारे का समंदर से भला ये फासला क्या है!
डुबा पाए न राही को सफ़र का रास्ता क्या है!
नया सा शौक लगता है तभी वो दर्द सुन लेते।
जरा पूछो उन्हें गीतों से मेरे वास्ता क्या है!
तुम्हारी लत नहीं अब छोड़ सकता छोड़ दूँ दुनिया ।
तुम्हीं से पूछता हूँ तुम बताओ मशवरा क्या है!
किए वादे निभाओ तब नया वादा बताओ फिर।
किया वादा अभी तोड़ा नया फिर वायदा क्या है!
फ़िकर तुम छोड़ दो मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा।
मुहब्बत के नशे में हूँ, अज़ी फिर मयकदा क्या है!
मुसलसल चाहना तुझको अगर ये पाप है कह दो।
भला खाते में मेरे अब तलक का कुल जमा क्या है!
अनंत महेन्द्र
ANANT MAHENDRA
रंग सारे फिज़ा के तुम्हीं से बने, ये महावर की लाली कहे न कहे।
साँझ ढल कर बताती है नाराज़गी, चेहरे की उदासी कहे न कहे।
रंग स्याही का छूकर ही मज़मून तुम, पढ़ सके क्या जो माँ कह न पाई कभी।
जज्ब बातें दिलों में दबाए रही, उनको कागज की चिट्ठी कहे न कहे।
नींव में थीं जो ईंटें दरकने लगीं, पर इमारत बुलन्दी को छूती रही।
कश्तियाँ तेज लहरों में खेता रहा, दर्द छालों का माझी कहे न कहे।
लड़कियाँ हैं हया की चुनर ओढ़ती, उनके चेहरे में लिक्खा रहेगा ग़मी।
भाँप लेना पिता तुम मुसीबत ख़ुदी, ख़ुद से आकर के बेटी कहे न कहे।
✍️ अनंत महेन्द्र
Tuesday, 20 March 2018
ग़जल
हमें कुछ भेड़ियों की खून की आदत नहीं दिखती।
हमें तब बेटियों पर आ रही आफत नहीं दिखती।
ये खतरे से नहीं खाली किसी पर यूँ भरोसा हो।
नकाबी नक्श के पीछे हमें सूरत नहीं दिखती।
किसी की शख़्सियत का बैठ अंदाज़ा लगाना मत।
किसी के शक्ल के पीछे छिपी फ़ितरत नहीं दिखती।
निगल जाते डकारे बिन सभी अज़गर जरा बचना।
अगर है चुप समंदर तो हमें जुर्रत नहीं दिखती।
किसी की कोशिशों का तुम जरा सम्मान कर लेना।
कि छोटी चींटियों में भीम सी कुव्वत नहीं दिखती।
सुनो ये मिल्कियत रह जायेगी मट्टी सरीखी ही।
खुदा को आदमी में दौलती मूरत नहीं दिखती।
अनंत महेन्द्र
मुक्तक
मुक्तक:
अब न पनिहारिनें मटकी उठाती है।
ना वो कभी कपड़े सुखाने छत पे आती है।
नवजात गोद में है और हाथ में मोबाईल।
मॉडर्न तरीके से माएँ ममता लुटाती है।
दूजे माले में क्या हुआ, मुझको पता नहीं।
काका बगल के न रहे, मुझको पता नहीं।
एक वक्त था बस्ती में सबको जानता था मैं।
भाई का वक्त है बुरा, मुझको पता नहीं।
Wednesday, 10 January 2018
आँखों में पानी रहे न रहे...ग़ज़ल
212 212 212 212
दो कदम संग तेरे मुहब्बत चलूँ ,
और कोई कहानी रहे ना रहे।
साँस थम जाये मेरी मुझे ग़म नहीं,
फिर भले ज़िन्दगानी रहे ना रहे।
दिल मे छप जाये तेरे निशाँ प्यार का,
और कोई निशानी रहे ना रहे।
वाहवाही ग़ज़ल को मिले तुझसे जो,
फिर ये जोशे-रवानी रहे ना रहे।
चंद नग़्में सुनो मेरे दिल की जरा,
जाने फिर ये ज़ुबानी रहे ना रहे।
आ लकीरें मिला ले जबीं(मस्तक,माथा) की अभी,
जाने फिर ये जवानी रहे ना रहे।
बूँद बह जाने दे मेरे अश्कों के भी,
जाने आँखों मे पानी रहे ना रहे।
©अनंत महेन्द्र
मुक्तक
मुक्तक:
जहर जो जातिवादी घुल रहा अपने बसर में भी
जला देगा बहुत है आग इसके इक असर में भी
सियासत जब लगे मिलने जहर के इन सपोलों से,
समझ लो आ गया मतदान अब अपने शहर में भी।
©अनंत महेन्द्र
मुक्तक:
सियासत ने अगर दी मात तो स्वीकार कर लेना।
कहीं टूटा अगर विश्वास तो इसरार कर लेना।
मगर गहरे हुए जो घाव तो चुपचाप ना रहना।
कलम की धार जिंदाबाद तुम प्रतिकार कर लेना।
© अनंत महेन्द्र
मुक्तक:
कहाँ को जा रहा इंसा कहाँ तक जा रहा इंसा
कभी इक दामिनी सी पुष्प को मुरझा रहा इंसा।
यहाँ बाबा मदरसे मौलवी के कर्म काले हैं।
अधर्मी बन चला हैवानियत को पा रहा इंसा।
©अनंत महेन्द्र
६/०१/२०१८
Sunday, 17 December 2017
आँखों में पानी रहे न रहे...
दो कदम ऐ मुहब्बत तेरे संग चलूँ ,
और कोई कहानी रहे न रहे।
साँस रुक जाए धड़कन की तो ग़म नहीं,
फिर भले जिंदगानी रहे न रहे।
दिल में छप जाए तेरे निशां प्यार की,
और कोई निशानी रहे न रहे।
बस गुज़र जाए कुछ वक़्त सोहबत में तेरे,
रात कोई सुहानी रहे न रहे।
वाहवाही ग़ज़ल को मिले तुझसे जो,
दुनिया मेरी दीवानी रहे न रहे।
आ लकीरें मिला लें माथे की अभी ही,
फिर ये चेहरा नूरानी रहे न रहे।
चंद गीतों को सुनने की मोहलत भी दे दो,
जाने कब ये ज़ुबानी रहे न रहे।
थोड़े अश्कों की बूँदे बह जाने दे मेरे,
जाने आँखों में पानी रहे न रहे।
®© अनंत महेन्द्र
१५/१२/२०१७
Tuesday, 1 August 2017
कश्मीर की झाँकी
एक दिन मेरे कमरे में
घुस गए साँप चार..
कश्मीरी पण्डितों सा
बाहर निकला परिवार..
इसी बीच बहुत से लोग
जमा हो गए..
आनन फानन में पुलिस
और सेना इत्तला हो गए..
अब मैं खुश था कि सेना
पल भर में इनको भगा देगी..
पर पशुप्रेमी मंत्री ने चेताया कि
चली गोली तो केस लगा देगी..
मजबूरन बन्दूक फेंक
सेनावाले ढेला चलाने लगे..
भागे नहीं साँप, जहर फेंकने को
अपना फन फैलाने लगे..
बोले कुछ पड़ोसी भाई
इनको क्यों भगा रहे हो..
छोटी सी बात का यूँ
बतंगड़ क्यों बना रहे हो..
चंद घण्टे में ही बात, वन की
ज्वाला सी फैलने लगी..
तेजी से चलने वाले दस
चैनलों में खबर चलने लगी..
कहने लगे मीडिया वाले,
जहर नहीं, साँप भी देखो..
बिंदी वाली संगठन बोली,
मानवाधिकार तो सीखो..
इतने में एक सिपाही ने
पैलेट गन चला दिया..
मारा गया था अभी एक ही साँप
घटना ने पूरा संसद हिला दिया..
एक विपक्षी नेता ने संसद में
साँपो की व्यथा-कथा सुनाई..
थोड़े दिनों पश्चात् ही सर्वोच्च
न्यायालय ने भी सहमति जताई..
मैं बेबस, असहाय यूँ ही
घर के बाहर खड़ा रहा..
और मेरे स्वर्ग से आशियाने में
साँप कुण्डली जमाये पड़ा रहा..
इतने में जो मेरा पड़ोसी मेरे
घर पर नजरें जमाये बैठा था..
आ गया साँपों से मिलने, हाथों में
मेढ़क और दूध का कटोरा था..
झाँसा मिला मुझे, अब मेरा घर
उसी पड़ोसी के कब्जे में था..
नेताओं ने दी उसे ही शाबाशी,
मैं निरीह तो बस सदमे में था..
हताश-निराश पछताता मैं
अनवरत दिन-रात रोता..
न देखने पड़ते ये दिन, ग़र सांपों को
खुद लाठी से कुचला होता..
"अनंत" महेन्द्र
वृद्धाश्रम
जो कभी तुझे उंगलियाँ पकड़कर,
सारी राह चलाता था।
तेरी छोटी-बड़ी ख्वाइशों के लिए,
पूरे माह कमाता था।
जो खुद कभी भूखा सो जाता पर,
तेरे टॉफियाँ लाता था।
तेरी एक हँसी मुस्कान देखने,
थककर भी घर वापस आता था।
तेरे बीसियों एक से प्रश्नों के,
जवाब वो हर बार देते थे।
तेरी हर जिद पूरी करने को,
सर्वस्व वार देते थे।
जिसके हर एक शब्द में,
कोई न कोई सबक होती है।
आज उनकी नेक सलाह भी,
तुम्हें बकबक लगती है।
आज जब तुम खुद बड़े हो गए,
पाँव पर अपने खड़े हो गए।
टूटी झोपड़ी अब मकान हो गया,
पैसों पे तुम्हें अभिमान हो गया।
पिता के ईलाज के पैसों को,
कहते हो नुकसान हो गया।
दो रोटी ही तो ज्यादा लगता है।
अरे वो तेरे बच्चों का दादा लगता है।
थोड़ा ही सही तुम ध्यान धरो।
उनके अनुभवों का सम्मान करो।
बस इतना ही तुम कर्म करो।
कि वृद्धाश्रम न फोन करो।
© अनंत महेन्द्र
Sunday, 30 July 2017
कलम की चाह
सुनो,बड़े दिनों से कुछ लिखा नहीं,
लिख दूँ क्या, तुम पर ही।
कूची का कलाकार तो नहीं,
कि बैठा रखूँ तुझे, सामने के सोफ़े पर।
पर मन तो चाहता है कि,
कलम मेरी जब-जब चले,
कुछ शब्द लिखे, जब भाव गढ़े।
तब लटें तेरी देख लिखूँ।
तेरे हाथ रहे ठोड़ी पर जब,
सिलवटें देख-देख लिखूँ।
तुम बैठे हुए थक जो जाओगी,
और कितनी देर! पूछ-पूछ उक्ताओगी।
मैं बहाने कर मुस्कुरा जाऊँ।
फिर चंद पंक्तियों की कविता सुनाऊँ।
फिर तुम ज़िद करो जाने की,
और मैं दूसरी कविता बनाने की।
सुनो, बडी देर से कुछ लिखा नहीं,
लिख दूँ क्या, फिर तुम पर ही।
© अनंत महेन्द्र
३१/०७/२०१७
Saturday, 15 July 2017
तेरी याद में
तेरी कमी से ख़ामोश दीवारों दरख़्त
परदे झाँकते अहाते की ओर हर वक्त
कालीन सिलवटों में उलझी ही रही
काँटे घड़ी की अटकी रहती कम्बख़्त
दरवाजे की घंटी जैसे रुष्ठ हो मुँह बना रही
तेरी प्यारी टीवी रिमोट ओट में छुप जा रही
अब इन्तेहाई का आलम तुझसे और क्या कहूँ
एक्वेरियम की मछलियाँ भी दाना मना कर रही
तो अब ये बता कि मैगज़ीन के पन्ने
हवाओं से फड़फड़ाते रहेंगे क्या।
बगीचे के फूल तेरे स्पर्श के बिना,
खिलने के पहले मुरझाते रहेंगे क्या।
सर्द हवाएँ बन्द खिडकियों से टकरा,
यूँ ही लौट जाते रहेंगे क्या।
ये तन्हाइयों की काली परछाइयाँ
इन पर खिलखिलाते रहेंगे क्या।
या फिर, दोगे इनके मौन सवालों के जवाब
कि ये फिर से मुस्कुरा जाएँ तेरी तरह
नहीं तो कह दो इन्हें भी की पड़े रहे
निर्वात में निष्प्राण, मेरी तरह
अनंत महेन्द्र
१३/०७/२०१७
Wednesday, 24 May 2017
चलते-चलते
आज फिर मिल गयी चलते-चलते
आँख फिर झुक गयी चलते-चलते
यूँ मेरे सामने से ना गुजरे वो।
साँस न रूक जाए चलते-चलते।
आज फिर मिल गयी चलते-चलते
आँख फिर झुक गयी चलते-चलते
पल भर में मैं जी गया बरसों।
वक्त ही थम गया चलते-चलते।
आज फिर मिल गयी चलते-चलते
आँख फिर झुक गयी चलते-चलते
मेरा हर रोम-रोम गवाह होगा।
कैसे दिल मचल गया चलते चलते।
आज फिर मिल गयी चलते-चलते
आँख फिर झुक गयी चलते-चलते
पर तेरा मुझसे अजनबी बनना।
सब कुछ कह गया चलते चलते।
©अनंत महेन्द्र
Monday, 22 May 2017
जद्दोजहद
वापसी वाली ट्रेन में
दिखा एक मोची।
डिब्बे में आया-गया,
दो बार मंडराया,
फिर मेरे बगल वाली सीट में,
बैठ गया संकोची।
पतली काया, साँवला मुख,
हाथों में लकड़ी का बक्सा।
जूते पालिश वाला साजो सामान,
उसने सीट के नीचे रखा।
फटी कमीज, नीली धारी की लुँगी,
और खुद की चट्टी पुरानी।
मस्तक की रेखाओं में उसके,
शायद छिपी थी कोई कहानी।
मैं बैठा उसकी व्यथा-कथा को,
गम्भीरता से पढ़ने को अकुलाया।
तभी अचानक उसने गिनते हुए उंगलियों को,
मन ही मन बुदबुदाया।
गिनी ही थी कुल चार उंगलियाँ,
सर हिला उसने पुनः दुहराया।
अब उसका मलीन सा चेहरा,
मेरी दृष्टि अपनी ओर मोड़ रहा था।
शायद वो मन में दस-दस के चार नोट और,
घर के खर्चों का हिसाब जोड़ रहा था।
© अनंत महेन्द्र
Saturday, 20 May 2017
फिर तेरी याद..
रात स्याह है, विरह की आग है,
और नींदों में बनावट है।
कुछ आह है, कुछ आहट है,
कुछ नमकीन सी सुगबुगाहट है।
फिर गगन तन्हा रोशनाई से,
आँगन तेरी अंगड़ाई से।
तममय राह है, व्यर्थ सजावट है,
और नमकीन सी सुगबुगाहाट है।
दीवारें करुण है नमीं से,
दरख़्त ख़ामोश तेरी कमी से।
क्षण अथाह है, वक्त से अदावत है।
और नमकीन सी सुबगुहाट है।
© अनंत महेन्द्र
Saturday, 22 April 2017
चुनौती
अट्टाहास करती तुम,
निरीह सा खड़ा मैं।
तेरे चुनौतियों के समक्ष,
बेसुध सा पड़ा मैं।
पल प्रतिपल हुंकार भरती,
मानस चित्त में टंकार करती।
तुझसे संघर्ष की मुद्रा में,
बस धरा का धरा मैं।
बेसुध सा पड़ा मैं।
पुनः संचित कर आत्मबल,
एकीकृत कर के नभ-तल।
तेरा सामना करने को,
और एक बार अड़ा मैं
बारम्बार खड़ा मैं।
© अनंत महेन्द्र
Friday, 10 February 2017
ख़ुश्क मौसम, रात रूमानी
थी।
वर्षों छिपा रखा था, वो बात बतानी थी।
कैसे इज़हार कर देता, जो उन्हें थी जल्दी।
चंद लफ्ज़ पड़ते कम, वर्षों की कहानी थी।
वो खुश्क मौसम था, वो रात रूमानी थी।।
खड़े अकेले दोनों,सफेद चादर के शामियाने में।
होते रहे असफल, एक-दूजे को समझाने में।
वक्त की थी पाबंदी, पर यूँ ही सारी रात बितानी थी।
न कह पाया वो बात, जो उसे बतानी थी।
वो खुश्क मौसम था,वो रात रूमानी थी।
विरह की घड़ी टिकटिक चल रही थी।
हृदय में भावनाओं की धारायें उमड़ रही थी।
तभी लाल सुर्ख जोड़े में दौड़ जाना पड़ा उसे।
स्वयं के हृदय को आघात लगा, हृदय छोड़ जाना पड़ा उसे।
फिर अश्रू की धार, और एक अधूरी कहानी थी।
न वो खुश्क मौसम था, अब न रात रूमानी थी।
अनंत महेन्द्र©®
Tuesday, 13 December 2016
क्षुदा की आग
बड़ी लम्बी फेहरिस्त है
इंसानी कामयाबी की
कोटि-कोटि अरबों के धन
चाँद में पहुँच बैठे हैं जन
मीलों दूर बैठे बतियाए
बस छोटे यंत्र कान लगाए
हृदय, गुर्दे तक बदले जाते
मरने वाले बचा लिए जाते
फैली कीर्ति दसों दिशा में
खूब करी तरक्की इंसा ने
पर इंसा तभी इंसा कहलाते
आग प्रत्येक क्षुदा की बुझा पाते
अनंत महेन्द्र ©

